हमेशा की तरह इस बार भी पश्चिम बंगाल में बड़े ही धूमधाम से मनाया गया दुर्गा पूजा का त्योहार।

पश्चिम बंगाल 24 अक्टूबर। तरुण मोहन-विशेष संवाददाता : इस बार पश्चिम बंगाल में बहुत ही धूमधाम से मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा 2026 को नजदी से समझने एवं आपको समझाने के उद्देश्य से हम पहुंचे पश्चिम बंगाल में खासकर के इस बार TMC तृणमूल-कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने एवं bjp भाजपा के सत्तासीन होने के पक्षपात पहुंचे। स्थानीय लोगों की मानें तो इस बार कुछ खास रहा; जोकि विश्व भर में प्रसिद्ध है.. जहां अगर हम बात करें मध्यकाल की तो
👉मध्यकाल (14वीं से 16वीं शताब्दी) : शास्त्रों में इसके पुराने संदर्भों के बावजूद, बंगाल में एक बड़े वार्षिक उत्सव के रूप में इसकी शुरुआत 16वीं शताब्दी में ताहिरपुर के राजा कंसनारायण और नदिया के जमींदार भवानंद मजुमदार के समय से मानी जाती है।
👉 बाबू संस्कृति का दौर [18वीं शताब्दी] : सन 1610 में सबर्ण ( सवर्ण ) राय चौधरी परिवार ने कोलकाता में पहली पारिवारिक पूजा शुरू की। सन 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद शोभाबाजार राजबाड़ी के राजा नवकृष्ण देब ने इसे बड़े स्तर पर आयोजित किया। तब यह त्योहार केवल राजाओं, नवाबों और अमीर जमींदारों के महलों (Thakur Dalan) तक सीमित था।
👉सार्वजनिक रूप (18वीं सदी के अंत से): 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुगली के गुप्तीपाड़ा में आम लोगों के सहयोग से ‘बारोवारी’ (12 दोस्तों द्वारा चंदा जुटाकर की गई सामूहिक पूजा) की शुरुआत हुई। इसके बाद यह त्योहार महलों से निकलकर आम जनता और हर समुदाय की सामूहिक धरोहर बन गया।
यही कारण है कि यूनेस्को (UNESCO) ने भी इसे किसी बंद धार्मिक दायरे में न मानकर, पूरे समाज की ‘सामूहिक सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में मान्यता दी है।
ज़मींदारों के महलों से निकलकर यह त्योहार कैसे आम जनता के बड़े पंडालों और दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक कला उत्सवों में तब्दील हो गया

इसमें अक्सर देखा जाता है कि विभिन्न पंडालों में मां दुर्गा के त्रिशूल के नीचे रावण को दिखाया गया है जिसके पीछे मुख्य सोच एवं कारण अकाल बोधन’ की पौराणिक कथा और आधुनिक पंडालों की विशेष कलात्मक थीम माना जाता है ।
इन दोनों मूर्तियों के एक साथ दिखने या इस त्योहार से जुड़े होने के कारणों को हम नीचे विस्तार (पंडाल भ्रमण हेतु विशेष स्थानीय सहयोगी श्री राजा ऋषि राय) से समझा रहे हैं..

अकाल बोधन’ की कथा {भगवान राम द्वारा दुर्गा पूजा}

कृत्तिकासी रामायण के अनुसार, रावण का वध करने और लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने शरद ऋतु (अश्विन मास) में माँ दुर्गा की असमय पूजा की थी, जिसे ‘अकाल बोधन’ कहा जाता है।
…शास्त्रों के अनुसार दुर्गा पूजा मूल रूप से वसंत ऋतु (बासंती पूजा) में होती थी।
…जब श्रीराम रावण से युद्ध कर रहे थे, तब रावण को परास्त करने के लिए उन्हें अपार शक्ति की आवश्यकता थी। उन्होंने नौ दिनों तक कठिन तपस्या कर माँ दुर्गा को प्रसन्न किया।
…चूँकि इस पूरी पूजा की पृष्ठभूमि ही श्रीराम द्वारा रावण के विनाश के लिए रची गई थी, इसलिए कुछ पंडालों में इस अकाल बोधन की पूरी कहानी को जीवंत करने के लिए मुख्य मूर्ति के आसपास रावण को भी दर्शाया जाता है।
इसके साथ ही हम आपको यह बताते चलें कि पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ ही इन दिनों आधुनिक युग के वाद्ययंत्र जिसमें कि डीजे आदि ने भी अपना एक खास स्थान बना लिया है।

और यदि आप किसी पंडाल की थीम “रामायण” या “श्रीराम की दुर्गा पूजा” पर आधारित है, तो कलाकार माँ दुर्गा की महिषासुर मर्दिनी वाली मूर्ति के साथ-साथ एक तरफ रावण की दशानन (दस सिरों वाली) मूर्ति या श्रीराम को तीर चलाते हुए भी शिल्प कला का हिस्सा बनाते हैं।
यदि यहां हम संक्षेप में कहें तो पारंपरिक रूप से माँ के त्रिशूल के नीचे केवल महिषासुर (असुर) होता है, लेकिन रामायण के संदर्भ और दशहरे के त्योहार का एक ही दिन (विजयदशमी) मेल होने के कारण, पंडालों की सजावट और कथा-चित्रण में रावण का जुड़ाव भी सामने आता है।

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