काशीपुर 25 अगस्त। गन्ने का साल सदन (रेड सेंट) रोग गन्ने का सर्वाधिक विध्वंसक रोग है, जो उत्तराखण्ड सहित पूरे देश में गन्ने की अनेक उन्नत किस्मों के पाहन के लिए उत्तरदायी है। यह रोग कोलेटोट्राइकम फाल्केटम नानक कवक से होता है. जी प्रतिवर्ष संक्रमित पोरिथी, मलबी तथा इसके ऐसे रोगाणुओं से फैलता है. जो संक्रमित फसल की कटाई के बाद भी खेत में पड़े रहते हैं। शर्करा उद्योग के साथ-साथ यह गन्ना उत्पादकों के लिए भी अपना हानिकारक है। अधिक आर्यता एवं जल निकास की उचित व्यवस्था न होना, फसल की कमजोर वृद्धि तथा बार-बार एक ही किस्म की बुवाई का होना भी रोग के विकास में सहायक होता है। वर्तमान समय में को 0238 नामक गन्ना प्रजाति लाल सड़न रोग से व्यापक रूप से आच्छादित हो गयी है।
अतः किसान भाईयों से अनुरोध है कि इस प्रजाति के गन्ने को लगाने से परहेज करें। इस रोग की प्रारम्भिक अवस्था में पीचा शुष्क एवं झुरिचार हो जाता है तथा तने को लम्बाई में चिरने पर अन्दर का गूदा लाल रंग का दिखाई देता है व इसमें से सिरकों जैसी गन्ध आती है। इस सम्बन्ध में आयुक्त गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग उत्तराखण्ड श्री त्रिलोक सिंह मर्तोलिया द्वारा सनी सहायक गन्ना आयुक्तों एवं चीनी मिलों को निर्देश जारी किये गये हैं। इस रोग से बचाव एवं नियन्त्रण हेतु गन्ना अनुसंधान केन्द्र, काशीपुर के वैज्ञानिकों द्वारा निम्न सुझाव दिये गये हैं, जिनका पालन किसान भाईयों की करना वाहिए।
(1) नरोग से प्रभावित पौषों को जड़ सहित निकालकर नष्ट कर दें तथा गड्ढों में 10 से 20 घाम बिरचिंग पावडर डालकर इक दें। इफ्को का सुर्याबाका (Azoxystrobin 11%+ Teubuconazole 18.3% SC)/ सिम्जेन्टा का एभीस्टारटॉप/एफ०एम०सी० का अजाका (Azoxystrobin 11% Difenoconazole 11.4% SC) का 300 से 350 मिली० को 200 से 250 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। उपरोक्त फफूंदीनाशक को पुन 15-20 दिन के अंतराल पर प्रयोग करें।
(2) लाल सहन रोग के लक्षण दिखाई देने पर बायोवीनेट निभाईल 70 WP को 425-500 ग्राम मात्रा को 300-350 लीटर पानी में घोल बनाकर पर्णी छिड़काव खड़ी फसल में करें। (3) रोग की सम्भावना प्रतीत होने पर खड़े गन्ने में ट्राईकोडर्मा 4 किग्रा) प्रति एकड़ की पर से प्रभावित गन्ना फसल में प्रयोग करें। (4) गन्ना बुवाई हेतु रोगमुक्त एवं उत्तराखण्ड प्रदेश में स्वीकृत गन्ना प्रजातियों का प्रयोग करें।
(5) को० 0238 प्रजाति की बुवाई किसानों के बीच में हतोत्साहित करने के लिए प्रयास किये जायें।
(6) बुयाई के पूर्व कटे हुए गन्ने की टुकड़ों को थायोकनेट मिथाईल 70 WP फफूंदनाशी का 14 ग्राम प्रति लीटर घोल बनाकर कम से कम 15 मिनट तक शोधन पश्चात गन्ना बुवाई करें।
(7) दाईकीमा (T.harzianeum) का 2 किग्रा०/एकड़ की दर से वर्मी कम्पोस्ट अभया गोबर की खाद में मिलाकर खेतों में पलेवा करते समय अथवा गन्ना बुवाई के समय मूलों में प्रयोग करें।
(8) गन्ना बीज उपचार नम गर्न शोधन संयंत्र द्वारा उपचारित कर गन्ना फसल की बुवाई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
(9) मृदा पी० ए७० मान 5-6 होने की स्थिति में रोगजनक का प्रभाव तेजी से होता है। अतः मृया पी०एच० मान को संतुलित रखना (7.0 pH) आवश्यक है।
(10) फसल चक्र के अनुसार गन्ना बुवाई करें। हरी खादों का समावेश आवश्यक है।
(11) फसल की निराई गुड़ाई रामय-समय पर करते रहें। खेतों में शरय क्रियाओं को ना करने से भाईसिलियम विकसित होता रहता है।
(12) प्रभावित भूखण्ड पर 12 वर्ष तक फसल ना अगाऐं।
(13) यूरिया उर्वरक अधिक एवं लम्बे समय तक प्रयोग करने से लाल सदन के साथ-साथ अन्य रोगों एवं कीटों का आपतन बढ़ता है। अतः संतुलित मात्रा में निर्धारित अवधि तक यूरिया उर्वरक का प्रयोग करना आवश्यक है।
(14) अधिक पर्चा होने पर लाल सहन से संक्रमित खेत का पानी किसी दूसरे खेत में जाने से रोकने हेतु उचित ने बनाएं।
(15) जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था करें। मिट्टी में जल अधिकतम होने से फफूंदी में वृद्धि होती है। प्रारम्भिक चरण के दौरान सूखे की स्थिति में भी रोग का संक्रमण तेजी से फैलता है। अतः सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था रखे।






